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उत्तराखंड में टूरिज्म का नया तरीका कर देगा हैरान
देश में विभिन्‍न कोनों में रहे उत्तराखंडियों की रिश्तेदारी उत्तराखंड के टूरिज्म को नई दिशा प्रदान करेगी। कैसे जानने के लिए पढ़ें... टिहरी जिले के गांव सत्यो, जमठियाल, सनेगल, भुष्टी और घेना में राणा, मिश्रा, सजवाण, नेगी, कठैतों की भारी बसावट है। अब इनके यहां बसने, इनकी समूचे देश में रिश्तेदारी और इनके नस्लीय संबंधों का पता लगाकर उन्हें यहां लाया जाएगा। इस नए प्रयास को नाम दिया जा रहा है जीनियोलॉजी टूरिज्म। इसके साथ ही इसको इको व दूसरे तरह केपर्यटन से भी जोड़ा जाएगा। टिहरी के जौनपुर में कुछ जुनूनी दीवाने युवा इस अनोखे तरह के पर्यटन व्यवसाय को शुरू कर रहे हैं। यह पूरी तरह से नया कॉन्सेप्ट है। यानी, जीनियोलॉजी को बेस बनाकर नवाचार करने वाले युवा उद्यमी इस नए कॉन्सेप्ट में बड़ा भविष्य देख रहे हैं।
कलाकारों ने बिखेरे लोक संस्कृति के रंग
गनेरी मैया मंदिर में चल रहे आठों कौतिक में शुक्रवार को तीसरे दिन भी लोक कलाकारों और स्कूली बच्चों ने संस्कृति के ऐसे रंग बिखेरे की दर्शक झूम उठे। इस दौरान हास्य कलाकारों की रचनाओं ने सभी को लोटपोट कर दिया। सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरुआत देवी वंदना दैंणी है जाये मेरी नंदा भगोती की बेहतरीन प्रस्तुति से हुई। इसके साथ ही सांस्कृतिक कला मंच चौखुटिया, गेवाड़ सांस्कृतिक मंच दिल्ली, बोनाफाइड पब्लिक स्कूल व लक्ष्मी नारायण स्कूल समेत अन्य स्थानीय कलाकारों की विविध रोचक व मनमोहक प्रस्तुतियों ने ऐसा समा-बांधा कि लोग देर शाम तक पंडाल में जमे रहे। दिल्ली से आए मंच के प्रसिद्ध लोक कलाकार शिव दत्त पंत, गोपाल मठपाल, भुवन आर्या, बसंती बिष्ट व कल्पना रौतेला के एकल गीतों से सभी को मंत्रमुग्ध किया। वहीं, सास्कृतिक मंच चौखुटिया की टीम ने भी दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया।
थिरकी पर्यटन नगरी
रानीखेत : 'खोल दे माता खोल भवानी धार में किवाड़ा..', सुदूर मंगचौड़ा के धार में दिल को छू देने वाली मां भगवती की स्तुति। पहाड़ की खड़ी चढ़ाई पर चैत के झोड़ा गीत पर बढ़ते कदम जैसे थकान पर भारी पड़ रहे थे। बुजुर्ग महिला-पुरुष गायकों की उमंग से भरी टोली युवा पीढ़ी को चैत्र मास की इस परंपरा को जिंदा रखने का संदेश देते माठू-माठ पर्यटन नगरी पहुंची। जहां पारंपरिक हुड़के की गमक, ढोलक की थाप व मजीरे की खनक पर दिन पर झोड़ा गीतों मोहक ध्वनि मुग्ध करती रही। यह पहला मौका था जब चैत्र मास पर कई दशकों बाद दूर गांव के बुजुर्ग गायकों की टोली ने नगर में परंपरा को जीवंत किया। खास बात कि इन महिला-पुरुषों में धरोहर के संरक्षण का जुनून देख युवाओं का जज्बा भी जाग उठा। सोमवार को ग्राम प्रधान मंगचौड़ा जयपाल सिंह मेहरा की अगुवाई में सैकड़ों महिला-पुरुष झोड़ा गाते खड़ी चढ़ाई पर थिरकते पर्यटन नगरी पहुंचे। 'ठुमा-ठुमा गंग नैउलौ ऐ छै साई म्यार दगाड़ा..' गीत पर माठू-माठ ऐतिहासिक सोमनाथ ग्राउंड रोड होते हुए ग्रामीण विजय चौक के पास रंगोली पार्क पहुंचे। यहां ब्लॉक प्रमुख एवं मंगचौड़ा से बीडीसी रचना रावत ने पारंपरिक अंदाज में ग्रामीणों का स्वागत किया। अल्प विश्राम के बाद 'चाकोटै की पार्वती तीलै धारौ बौला..', 'ओ परू डाखाड़ बतै दे छम् .. डाखाड़ा पोखर बतुनी छम..' आदि गीतों पर गोल घेरे में हाथों से हाथ बांध सामाजिक एकता का संदेश देते लोग मुख्य बाजार से शिव मंदिर प्रांगण पहुंचे। यहां शाम तक झोड़ा गीत-नृत्य का दौर अनवरत चला।
नैनी झील के 'प्राण' सूखाताल में
नैनी झील नैनीताल की जीवनदायिनी है और इस झील के प्राण सूखाताल पर टिके हैं। यकीन भले न हो, लेकिन वैज्ञानिकों की ताजा रिपोर्ट यही कहती है। हर साल सूखाताल से 50 प्रतिशत पानी जमीन से रिसते हुए नैनी झील तक पहुंचता है और झील तक आते-आते इसे कई महीने लग जाते हैं। यही नहीं, शहर का पर्दाधारा स्रोत भी सूखाताल पर निर्भर है। वैज्ञानिकों ने अपनी संस्तुति में चेताया है कि अगर सूखाताल को बचाया न गया तो नैनी झील के अस्तित्व के लिए खतरा बढ़ जाएगा। इसके लिए जिलाधिकारी को कुछ सुझाव सौंपे गए हैं। सेंटर फॉर इकोलॉजी डेवलपमेंट एंड रिसर्च (सीडार) की ओर से शुक्रवार को नैनीताल में जुटे वैज्ञानिकों ने सूखाताल की भयानक तस्वीर पेश की। रिपोर्ट के अनुसार 1995 के बाद सूखाताल के कैचमेंट एरिया में बेतहाशा निर्माण हुए हैं। इसकी सतह तक सिल्ट भर गई है। कूड़ा डंप हो रहा है। सबसे पहले सिल्ट को निकालकर इसकी गहराई को बढ़ाना होगा। क्योंकि सिल्ट की वजह से नैनी झील के लिए रिसकर आने वाले पानी की रफ्तार कम हो रही है। वैज्ञानिकों ने यह भी बताया कि नैनीताल में साल में जितनी बारिश होती है, उससे ज्यादा पानी सूखाताल से निकल रहा है। नैनीताल को सूखाताल झील पीने के लिए 10 प्रतिशत पानी देती है। यदि पंपों से निकलने वाले पानी को सूखाताल में जमा किया जाए तो इसका आकार 11 मीटर ऊंचा किया जा सकता है। आइआइटी रुड़की की ओर से 2014 में सूखाताल और नैनी झील का सर्वे किया गया। सर्वे रिपोर्ट में दोनों तालों का लिंक संभव नहीं होने की बात कही गई थी, लेकिन पिछले साल कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के भूगोल विभाग के सहयोग से फिर सर्वे हुआ। सीडार के सह समन्वयक डॉ. विशाल सिंह, डॉ. चेतन अग्रवाल, अनविता पांडे, डॉ. राजेश ठडानी ने फरवरी-2014 से इस साल फरवरी तक रिसर्च में पूरे तथ्यों के साथ नई रिपोर्ट पेश कर प्रशासन को चौंका दिया है। नैनी झील से सूखाताल 45 मीटर ऊपर है। बरसात के मौसम में झील को पानी की जरूरत नहीं रहती और तब सूखाताल रिचार्ज होता है। गर्मी और जाड़े में नैनी झील का जलस्तर कम होने पर सूखाताल का जमीन से रिसकर आने वाला पानी झील को प्राण देता है।
नेचर, एडवेंचर और वाइल्ड लाइफ का पैकेज
धनोल्टी देवदार, बांझ और ओक के घने जंगलो के बीच ‌स्थित उत्तराखंड का एक खूबसूरत हिल स्टेशन है। पहाड़ों की रानी मसूरी से चंबा मार्ग पर महज 24 किमी की दूरी पर यह स्थित है। धनोल्टी 2286 मीटर की ऊंचाई पर प्रकृति की गोद में बसा हुआ है, जहां से हिमालय की कई चोटियों का दीदार किया जा सकता है। तो फिर सोच क्या रहे हैं, राजधानी दून से 60 किमी दूर ही तो जाना है ना...हो जाइये तैयार प्रकृति की गोद में सुकून की नींद और हिमालय की ठंडक समेटने के लिए। क्लाइमेट धनोल्टी का क्लाइमेट इसे एक परफेक्ट वीकेंड प्लानर की सूची में खड़ा करता है। गर्मियों में धनोलटी का अधिकतम तापमान 32 से 37 डिग्री रहता है। इस दौरान भी यदि बारिश हो जाए तो तापमान में तेजी से गिरावट भी आ जाती है। सर्दियों में यही तापमान गिरकर माइनस 1 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे चला जाता है। बर्फवारी देखने के लिए सामान्‍यतः यहां पर्यटक दिसंबर और जनवरी के महीने खासतौर पर अधिक पहुंचने लगते हैं। आपके ठहरने का इंतजाम पर्यटकों से भरे रहने के कारण धनोल्टी में कुछ दिन सुकून के गुजारने के लिए होटल और लॉज की कोई कमी नहीं है। वन विभाग के बंबू हट समेत गढ़वाल मंडल विकास निगम के गेस्ट हाउस आपके स्वागत के लिए यहां हर वक्त मौजूद हैं। आप ज्यादा बेहत्तर सुविधाएं चाहते हैं तो इसके लिए धनोल्टी के 8-10 किमी के दायरे में ही कई बेहतरीन होटल मौजूद हैं। आपके लिए खास यूं तो पूरा धनोल्टी ही अपने आप में खास है, लेकिन देवदार से घिरा इसका ईको पार्क, ढलवा पहाड़ियों पर छोटे-छोटे बिखरे हुए खेत और बादलों से झांकता हिमालय आपको बरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर लेंगे। वाइल्ड लाइफः धनोल्टी के आसपास घने जंगल होने से यहां भालू, तेंदुआ और हिरन की कुछ प्रजातियां अक्सर देखने को मिल जाती हैं, बशर्ते आपकी किस्मत मजेदार हो। नेचरः हिमालय की चोटियों से लेकर धनोल्टी के तलहटी में फैली गांवो की घटियां और जंगल आपको प्रकृति के बेहद करीब होने का एहसास दिलाएंगे। एडवेंचरः एडवेंचर के लिए यहां कई निजी होटल स्वामियों ने ट्री हट, साइकिलिंग और क्लाइबिंग की व्यवस्‍था की हुई है। धार्मिक स्‍थल धनोल्टी से चंबा मार्ग पर ही सात किलोमीटर आगे बढ़ने पर कद्दूखाल एक छोटा सा कस्बा है। यहीं से प्रसि। सिद्घपीठ सुरकंडा देवी तक जाने का मार्ग है। यहां से 4 किमी की चढ़ाई चढकर मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। बेहद खूबसूरती से प्राचीन शैली का ख्याल रखते हुए मंदिर का सौन्दर्यीकरण किया गया है। मंदिर परिसर में जितनी आत्मशांति का आपको एहसास होगा शायद ही ऐसा अनुभव हिमालय की गोद में आप कहीं और पा सकें। कद्दूखाल में ही कुछ निजी लॉज के साथ ही गढ़वाल मंडल विकास निगम का गेस्ट हाउस भी बहुत कम दाम में आपको ठहरने की सुविधाएं मुहैया करवाने को यहां मौजूद है। कैसे पहुंचे धनोल्टी पहुंचने के लिए सबसे नजदीकी एयरपोर्ट जौलीग्रांट है, जहां के लिए दिल्ली से नियमित उड़ाने हैं। इसके अलावा देहरादून तक रेलमार्ग या बस के जरिए भी यहां से आगे बस और टैक्सी से धनोल्टी पहुंचा जा सकता है।
पर्यटकों को खूब भा रही हैं चोपता की वादियां
बदरीनाथ और केदारनाथ धामों के साथ ही पंच केदारों को जोड़ने वाले ऊखीमठ-चोपता-गोपेश्वर मोटर मार्ग और इसके समीप अभी भी तीन फीट बर्फ जमी हुई है। उत्तराखंड के मिनी स्विटरलैंड कहे जाने वाले चोपता में भी पर्यटक आने लगे हैं। यहां प्रतिदिन 15 से अधिक यात्री पहुंचने लगे हैं। अभी भी जमी हुई है बर्फ ऊखीमठ-चोपता-गोपेश्वर मोटर मार्ग बार-बार बर्फबारी से बंद हो जाता था, लेकिन पर्यटकों की परेशानी को देखते हुए चमोली जिला प्रशासन ने लोनिवि को इस बार बर्फबारी में भी सड़क को सुचारु रखने के निर्देश दिए थे। इसका परिणाम यह रहा कि मार्ग खुला रहा और बीते फरवरी माह से 15 मार्च तक चोपता क्षेत्र में 355 पर्यटक सैर-सपाटे पर पहुंचे। चोपता में होटल व्यवसायी मनबर सिंह ने कहा कि यहां दूर-दूर तक फैली ढलानों में अभी भी दो से तीन फीट बर्फ जमी है। पर्यटकों की पहली पसंद चोपता में ट्रैकिंग दल के सदस्य मनोज भंडारी ने बताया कि पर्यटकों की पहली पसंद चोपता ही रहती है। दिल्ली से दोस्तों के साथ चोपता के सैर-सपाटे पर आए कुलभूषण चक्रवर्ती का कहना है कि उत्तराखंड के पर्यटन स्थलों को विकसित करने की जरूरत है। कई जगहों पर सड़क क्षतिग्रस्त है, जिससे चोपता तक पहुंचने में दिक्कत हुई। इनका है कहना पर्यटक स्थलों में घास और रिंगाल के हट्स बनाए जा रहे हैं। पर्यटकों को पूरी सुविधाएं दी जाएंगी। जिले के ट्रैकिंग रूटों को भी दुरुस्त किया जा रहा है। वर्ष 2013 की आपदा का पर्यटकों में कोई खौफ नहीं है।
पर्यटन, साहसिक खेलों के लिए उत्तराखंड सुरक्षित
पर्यटन और साहसिक खेलों के लिहाज से उत्तराखंड पूरी तरह सुरक्षित है। अब यह संदेश एडवेंचर टूर ऑपरेटर एसोसिएशन ऑफ इंडिया पर्यटकों को देगी। एसोसिएशन का मानना है कि बीती 16-17 जून की आपदा के बावजूद प्रदेश साहसिक खेलों के लिहाज से पूरी तरह से सुरक्षित है। यही वजह है कि एसोसिएशन ने इस बार का वार्षिक अधिवेशन शिवपुरी (ऋषिकेश) में आयोजित करने का फैसला किया है। पूरे देश के एडवेंचर टूर ऑपरेटर्स शामिल एसोसिएशन ने 24-25 मार्च को हो रहे अधिवेशन में सतत एवं गतिशील पर्यटन की थीम को मुख्य आधार बनाया है। अधिवेशन में पूरे देश के एडवेंचर टूर ऑपरेटर्स शामिल होंगे। बीती 16-17 जून की आपदा का सबसे अधिक प्रभाव प्रदेश के पर्यटन व्यवसाय पर ही पड़ा है। सीआईआई के एक आकलन के मुताबिक करीब 25 हजार करोड़ रुपये का नुकसान पर्यटन क्षेत्र को आपदा के कारण हुआ। समूचा प्रदेश आपदा से प्रभावित नहीं आपदा के बाद से पर्यटक उत्तराखंड की ओर कम ही रुख कर रहे हैं जबकि मसूरी, नैनीताल और अन्य कई पर्यटक स्थल हैं जो आपदा की मार से अछूते हैं। कुछ समय पहले प्रदेश सरकार ने भी यह संदेश देने की कोशिश की थी कि समूचा प्रदेश आपदा से प्रभावित नहीं है। अब एडवेंचर टूर ऑपरेटर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के आयोजकों का भी कहना है कि उत्तराखंड में 80 प्रतिशत इलाके आपदा से प्रभावित नहीं हैं, पर संदेश यह गया है कि पूरे उत्तराखंड पर आपदा की मार पड़ी है।

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